ये बात है उस ज़माने की ,
जब हर सुबह चेहरे पे एक मुस्कुराहट सज जाती थी.
और बाहे फेलाए,
एक ज़िन्दगी हमारा इंतज़ार करती थी.
कहती थी , “चल चले मुसाफिर , इस हसीन सफ़र पर ”
हम भी खिलखिला उठते थे ,
चल पड़ते थे ,
हर नए दिन को जीने ,
जीवन रस को पीने .
रंग इतने रंगीन लगते थे ,
नज़ारे इतने हसीन .
बिन कुछ कहे हस पड़ते थे ,
आँखों में एक चमक रहती थी
अब हर सुबह उठते है ,
तैयार तो होते है सर से पाँव तक ,
बस इस चेहरे ने पहनी नहीं होती ,
उस गुज़रे ज़माने की मुस्कराहट
जीवन रस का घड़ा ,
शायद हो गया खाली.
अब तोह इन् कडवे जाम के प्यालो मे,
ढुंते है जिंदगानी
क्या हुआ उस ज़माने का ,
किसे पता ?
उस हसीन ज़िन्दगी को ,
कोई ढूंढे भला ...




